प्रेरणा:'अपना घर आश्रम' से 90 निराश्रितों का देहदान, मानवता के लिए उदाहरण
वाराणसी। अपना घर आश्रम निराश्रितों को सम्मानजनक जीवन प्रदान करने के साथ-साथ मेडिकल शिक्षा को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। आश्रम में रहने वाले प्रभुजनों की मृत्यु के बाद उनके शरीर का दान प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों को किया जा रहा है, जिससे छात्रों को मानव शरीर रचना विज्ञान के अध्ययन में आसानी हो रही है।
डॉ. कुमार निरंजन और उनकी पत्नी डॉ. कात्यायनी द्वारा संचालित इस आश्रम में वर्तमान में 600 से अधिक बेसहारा, बीमार और निराश्रित लोग रह रहे हैं। डॉ. निरंजन इन्हें 'प्रभुजी' कहकर संबोधित करते हैं। सड़कों पर भटकते इन लोगों को आश्रम में न केवल आश्रय मिलता है, बल्कि सम्मानजनक जीवन भी प्रदान किया जाता है।
मेडिकल छात्रों के लिए मानव शरीर की उपलब्धता हमेशा बड़ी चुनौती रही है। बीएचयू में एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान खुद डॉ. कुमार निरंजन ने इस समस्या का सामना किया था। उस समय प्रदेश के अधिकांश मेडिकल कॉलेजों में शव मिलना बेहद मुश्किल था। इसे ध्यान में रखते हुए उन्होंने देहदान की अनूठी मुहिम शुरू की।
आश्रम में प्रभुजी की मृत्यु के बाद उनके शरीर को जलाया या दफनाया नहीं जाता, बल्कि उनकी पूर्व सहमति से मेडिकल कॉलेजों को दान कर दिया जाता है। यह देहदान छात्रों के शोध और अध्ययन का आधार बनता है तथा मानवता की सेवा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है।
2018 से संचालित इस आश्रम ने अब तक 90 प्रभुजनों का देहदान विभिन्न मेडिकल कॉलेजों को किया है। इनमें बीएचयू, वाराणसी स्थित हेरिटेज मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर, प्रयागराज, आजमगढ़, गाजीपुर और जौनपुर के कॉलेज शामिल हैं। सबसे अधिक देहदान बीएचयू के एनाटॉमी विभाग को किए गए हैं।
मृत्यु के बाद शरीर को डीप फ्रीजर में सुरक्षित रखा जाता है। इसके पश्चात प्रशासनिक व कानूनी प्रक्रियाएं पूरी कर शव को रजिस्टर्ड मेडिकल कॉलेजों को सौंपा जाता है। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के अनुरूप होती है।
महर्षि दधीचि की तरह काशी की पावन धरती पर बसा अपना घर आश्रम परोपकार और त्याग की परंपरा को जीवंत रखे हुए है।
खबर साभार-दैनिक जागरण , 28 जुलाई, 2025

