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परिवार के सदस्यों की ओर से दानियों के लिए श्रद्धा शब्द

मृत्यु अंत नहीं, एक नए जीवन की शुरुआत

श्री राधे श्याम सोबती जी

"मृत्यु किसी जीवन का अंत हो सकती है, लेकिन यह किसी और के लिए एक नई शुरुआत भी हो सकती है।"इस सोच को साबित किया नई दिल्ली निवासी श्री राधे श्याम सोबती जी ने। उनका परलोक गमन 91 वर्ष की आयु में हुआ। उनका अपने जीवन में लिया गया एक साहसिक निर्णय उनकी मृत्यु के बाद भी कई लोगों के जीवन में रोशनी कर गया। अपनी अंतिम इच्छा को पूर्ण करते हुए, उनके परिवार ने दधीचि देह दान समिति के माध्यम से उनकी आंखों और त्वचा का दान किया। यह दान श्री सोबती जी की नेक सोच का परिणाम था। उनका मानना था कि अच्छाई का फल जरूर वापस मिलता है, और इसी सोच ने उन्हें नेत्र दान और त्वचा दान के लिए प्रेरित किया, जिसके लिए उन्होंने समिति के द्वारा संकल्प लिया था।

उनके पुत्र श्री विकास सोबती जी ने उनके जीवन के विषय में कुछ जानकारी साझा की:" उनका जन्म अविभाजित पंजाब (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। उन्होंने अंबाला से दसवीं की पढ़ाई पूरी की और वहीं सर्जिकल उपकरणों का अपना व्यवसाय शुरू किया।वह एक पारिवारिक और सामाजिक व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने माता-पिता, भाई-बहनों, पत्नी और बेटे के प्रति अपनी सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। वह एक धैर्यवान और लोगों की सहायता करने वाले व्यक्ति थे। उन्हें ज्ञान की प्यास थी; अखबार पढ़ना, साइकिल पर घूमना और घड़ी पहनना उनके शौक थे। अंतिम समय में परिवार द्वारा उनकी इच्छा पूरी की गई। दधीचि देहदान समिति श्री सोबती जी के इस महान दान और उनके परिवार को नमन करती है।

एक प्रेरणादायक जीवन की मिसाल

श्री बृजमोहन कपूर

श्री बृजमोहन कपूर जी, जो कि सफदरजंग एंक्लेव, नई दिल्ली में निवास करते थे, का 10 जुलाई 2025 को 80 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार, परिवार ने दधीचि देहदान समिति के माध्यम से गुरु नानक आई हॉस्पिटल में उनकी आंखों का दान और पार्थिव शरीर को श्री अटल बिहारी वाजपेयी मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा शिक्षा हेतु समर्पित किया।

उनकी पुत्री, श्रीमती मुकता कपूर जी ने अपने पिताजी के विषय में कुछ जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि उनके पिताजी एक अत्यंत स्नेही व्यक्ति थे, जिनके लिए परिवार हमेशा सर्वोपरि था। सरगोधा, पाकिस्तान में जन्मे और पूरे भारत में पले-बढ़े, उन्होंने अपना जीवन उत्तर प्रदेश की सहकारी चीनी मिलों में काम करते हुए बनाया, जिसमें समर्पण और विनम्रता दोनों समान रूप से निहित थे। 2002 में उनकी मां के निधन के बाद, वे परिवार के लिए शक्ति और देखभाल का निरंतर स्रोत बने रहे। अपनी बड़ी बहन से प्रेरित होकर, उन्होंने भी अपने शरीर और आंखों का दान करने का विकल्प चुना, यह कहते हुए, "यह मेरा सबसे बड़ा दान होगा।" इस निस्वार्थ कार्य के माध्यम से, वे हममें और हमसे परे भी जीवित हैं।

दधीचि देहदान समिति दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करती है और उनके परिवार को नमन करती है।

मानव कल्याण को समर्पित जीवन

श्रीमती सीता माहेश्वरी

श्रीमती सीता माहेश्वरी जी का देहावसान 20 अगस्त 2025 को हुआ। उनकी अंतिम इच्छा को पूर्ण करते हुए, उनके पार्थिव शरीर का दधीचि देह दान समिति द्वारा देहदान किया गया, जो वास्तव में एक महादान है।

उनके पुत्र संजीव माहेश्वरी जी ने इस विषय में हमसे कुछ बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि उनकी माताजी ने वर्ष 2015 में ही मानव मात्र के कल्याण के लिए अपनी देह दान करने का संकल्प ले लिया था। संजीव जी ने कहा, "जिस प्रकार माता-पिता की संपत्ति संतान को प्राप्त होती है, उसी प्रकार माता-पिता की इच्छापूर्ति करना भी संतान का नैतिक दायित्व है। जिसका पालन करने में हम सफल रहे, इसका हमको गर्व है।"

उन्होंने आगे बताया कि उनके माता-पिता दोनों धार्मिक प्रवृत्ति के थे और प्रत्येक वर्ष वैदिक यज्ञ में मुख्य यजमान का दायित्व वहन किया करते थे। मां की मृत्यु उपरान्त, परिवार ने दधीचि देहदान समिति से केवल एक बार संपर्क कर सूचना दी, जिसके बाद नेत्र और देहदान से संबंधित सारे कार्य निर्बाध रूप से संपन्न होते चले गए, जिसके लिए उनका परिवार आभारी है।

शोक की इस घड़ी में अपनी संवेदना व्यक्त करने अनेक परिजन, मित्र और परिचित उनसे मिलने आए। कुछ ने इस निर्णय की प्रशंसा की, जबकि कुछ ने मां की सद्गति के लिए परंपरागत तेरहवीं संस्कार तक गरुड़ पुराण पाठ कराने का सुझाव दिया। किंतु, परिवार ने अपनी माँ की इच्छा अनुसार तीसरे दिन ही सभी मृतक संस्कार संपन्न कर दिए।

संजीव जी ने अपने माता-पिता के विचारों को बताते हुए कहा कि वे उन्हें समझाते थे कि जब तेरह दिन के शोक का विधान किया गया था, तब मृत्यु की सूचना पहुंचने में ही चार-पांच दिन लग जाते थे और आवागमन के सीमित साधन होते थे। तब के हालातों को देखते हुए यह परंपरा स्थापित की गई थी। लेकिन आज जब एक क्लिक पर उसी समय में दूसरे व्यक्ति को संदेश मिल जाता है और द्रुत गति के आवागमन के साधन उपलब्ध हैं, तब परिवार में शोक का लंबा वातावरण बनाए रखना उचित नहीं लगता। उनकी इस भावना का भी सम्मान किया गया।

मानवता के लिए देहदान और अंगदान

श्रीमती आशा कुमारी

रोहिणी निवासी श्रीमती आशा कुमारी जी का निधन 73 वर्ष की आयु में 13 अगस्त, 2025 को हुआ। उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए, दधीचि देह दान समिति द्वारा उनका अंगदान और नेत्रदान संपन्न हुआ, जो मानवता के लिए उनका एक महान संकल्प था।दिवंगत आशा कुमारी जी के भाई, दिलीप कुमार जी, ने उनके विषय में कुछ बातें हमसे साझा कीं। उन्होंने कहा, "बहुत ही प्यारी थी मेरी बहन आशा।" उन्होंने बताया कि उम्र में वह उनसे पांच साल बड़ी थीं, परन्तु 22 वर्ष पूर्व माता-पिता के स्वर्गवास होने के पश्चात् उन्होंने उसे हमेशा अपनी माँ समझा और उनकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का हर समय पूरा ख्याल रखा।आशा कुमारी जी हमेशा मुस्कुराती रहती थीं और हर छोटे-बड़े को मान-सम्मान देती थीं—चाहे वह पड़ोसी हों, परिवार के सदस्य, ऑफिस में साथ काम करने वाले कर्मचारी, या किसी भी उम्र का बच्चा हो। दिलीप जी ने बताया कि सभी उनकी मुस्कान के दीवाने थे। दोस्ती भी उन्होंने खूब निभाई। अपना कोई जीवनसाथी न होने पर भी रिश्ते कैसे निभाए जाते हैं, यह उनकी खूबी थी। वह हर समय, हर किसी की सहायता के लिए तत्पर रहती थीं।वह नारायण सेवा संस्थान से जुड़ी हुई थीं और वहां के एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अंगदान का निश्चय किया था, जिसके बारे में उन्होंने परिवार के सभी सदस्यों को बताया था। उनकी अंतिम इच्छा भी यही थी।दधीचि देहदान समिति आशा कुमारी जी और उनके परिवार को नमन करती है और प्रार्थना करती है कि ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे।

बुझने के बाद भी उजाला

श्रीमती कमलेश चुग

श्रीमती कमलेश चुग जी का परलोक गमन 91 वर्ष की आयु में 16 अगस्त 2025 को हुआ। उनकी इच्छा के अनुरूप, दधीचि देहदान समिति द्वारा उनके नेत्रदान का कार्य एम्स (AIIMS) में संपन्न कराया गया। यह नेत्रदान वास्तव में वह दीप है जो बुझने के बाद भी किसी और की जिंदगी में उजाला करता है।

आर्य समाज, पश्चिम विहार की संस्थापक सदस्य रहीं श्रीमती कमलेश चुग अपने जीवन में न सिर्फ धर्म और सेवा के मार्ग पर चलीं, बल्कि एक सशक्त मातृशक्ति बनकर अपने परिवार को प्रेम और ज्ञान से जोड़े रखा। वेदों का अध्ययन, एवं यज्ञ और ओ३म् का जाप उनका दैनिक नित्य का नियम था। उनके ज्ञान की गहराई हर बातचीत में झलकती थी।

उनका मानना था कि हर व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छा होता है, और वे सदा उसी अच्छाई को देखने का प्रयास करती थीं। आयुर्वेद में गहरी रुचि रखते हुए उन्होंने प्राकृतिक उपचार को जीवन का हिस्सा बना लिया था। अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहते हुए वे दूसरों को भी स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्रेरित करती थीं।

उनके भीतर गजब की करुणा थी—न कभी किसी के लिए बुरा सोचा, न कहा। अपने सहज प्रेम, सेवा भाव और सकारात्मक दृष्टिकोण से उन्होंने सभी के दिलों में एक अमिट स्थान बना लिया। दधीचि परिवार दिवंगत आत्मा को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता है।

मृत्यु अंत नहीं, जीवन एक दिव्य संदेश है!

श्री अरुण प्रकाश पेलीवाल

श्री अरुण प्रकाश पेलीवाल जी का देहावसान 31 अगस्त 2025 को हुआ। उनकी अंतिम इच्छा को पूर्ण करते हुए, दधीचि देहदान समिति द्वारा उनका नेत्रदान और देहदान जी टी वी हॉस्पिटल में कराया गया।अरुण भैया का जीवन मानवता के लिए एक उदार प्रेरणा एवं दिव्य संदेश है। उनका जीवन हमें यह सीख देता है कि हर व्यक्ति अपनी परिस्थिति से संघर्ष करते हुए भी भगवान के दर्शाए पथ पर अग्रसर हो सकता है। उदार व्यक्तित्व और मानव सेवा का प्रबल भाव रखने वाले हमारे भाई ने जीवन में निरंतर कठिन एवं विपरीत परिस्थितियों का सामना किया। कई लोगों ने उनकी उदारता का लाभ उठाते हुए उन्हें क्षति पहुंचाई और उनकी संपत्ति हड़पने का प्रयास करते रहे। परंतु, अरुण भैया की दृढ़ता को नहीं तोड़ पाए। उन्होंने ऐसे दुर्व्यवहार करने वाले लोगों से दूरी बनाकर अपने आप को नेक कामों में लिप्त रखा। उन्होंने हमेशा दूसरों की सहायता की और करुणा का पथ अपनाया।इस महान आत्मा ने जीवन भर अपने वेतन से एक साधारण जीवन जिया और अपने पैसे का उपयोग अपने समीप परिवारजनों, सहायक एवं पड़ोसियों के उद्धार हेतु किया।

उनके परिवार ने साझा किया कि डिजिटल युग के आरंभ में जब कंप्यूटर उपयोगी हुआ था, तब परिवार के सदस्य उसे खरीदने में सक्षम नहीं थे और इंटरनेट कैफे में जाकर काम पूरा करना पड़ता था। जब अरुण भैया ने यह जाना, तो उन्होंने निःसंकोच उनके लिए एक डेस्कटॉप कंप्यूटर खरीदा। उनकी इस उदारता ने परिवार का जीवन बदल दिया और वे अपने आर्थिक जीवन को व्यवस्थित करने में सफल हुए। उनके पड़ोसी, जो उन्हें प्यार से "बाबा" बुलाते थे, आज भी उनकी करुणा और उदारता की कहानियां सुनाते हैं।