देहदानियों का उत्सव-64, उत्तर-पूर्वी दिल्ली
दधीचि देहदान समिति द्वारा देहदानियों का 64वां उत्सव आज २६ अप्रैल को यूसीएमएस और जीटीबी हॉस्पिटल के सभागार में अत्यंत गरिमामयी वातावरण में मनाया गया। इस पावन अवसर पर एक ओर जहां दिवंगत पुण्य आत्माओं के त्याग को नमन किया गया, वहीं दूसरी ओर 100 से अधिक सजग नागरिकों ने नेत्रदान, अंगदान और देहदान का सामूहिक संकल्प लेकर समाज में एक नई मिसाल पेश की।
कार्यक्रम में दधीचि देहदान समिति के संरक्षक श्री आलोक कुमार, यूसीएमएस के प्रिंसिपल डॉ. धीरज शाह और एनाटॉमी विभाग की डायरेक्टर डॉ. रेणु चौहान मुख्य रूप से उपस्थित रहीं। वात्सल्य ग्राम, वृंदावन से पधारीं साध्वी समाहिता जी का आशीर्वचन सभी को प्राप्त हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता समिति के अध्यक्ष डॉ. महेश पंत ने की, जबकि पूरे भव्य आयोजन के सूत्रधार उत्तर पूर्वी क्षेत्र के संयोजक श्री अशोक बंसल रहे। इस अवसर पर समिति की वरिष्ठ सदस्य श्रीमती मंजू प्रभा, महामंत्री डॉ. विशाल चड्ढा, श्रीमती बबीता मल्होत्रा और उपाध्यक्ष श्री सुधीर गुप्ता का विशेष सानिध्य प्राप्त हुआ।
दानी परिवारों का सम्मान और संकल्प का आह्वान
कार्यक्रम के आरंभ में उन अमर परिवारों का भावपूर्ण सम्मान किया गया, जिन्होंने अपने परिजनों के देहावसान के बाद उनके नेत्रदान, अंगदान और देहदान के संकल्प को दृढ़ता से पूरा किया। समिति के अध्यक्ष डॉ. महेश पंत ने संस्था के कार्यों का विस्तृत परिचय देते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपने जीवनकाल में ही इस महादान का प्रण लेना चाहिए ताकि समाज को एक नई दिशा मिल सके।
यूसीएमएस कॉलेज के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. विनोद ने समिति के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा,"अंगदान और देहदान से बडा कोई दूसरा दान नहीं है। जीवित रहते हुए व्यक्ति किडनी और लीवर का कुछ भाग दान कर सकता है, पर समाज में इस बात की जागरूकता बहुत आवश्यक है कि 'ब्रेन डेड' की स्थिति में हार्ट और लंग्स (फेफडे) का भी सफल ट्रांसप्लांट हो सकता है। इस दिशा में दधीचि देहदान समिति का कार्य अनुकरणीय है।"
चिकित्सा शिक्षा में मानव शरीर का महत्व
कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. धीरज शाह ने अपने विद्यार्थी जीवन के संस्मरण साझा करते हुए बताया कि मानव शरीर की जटिलताओं को समझने के लिए एक वास्तविक मानव देह की कितनी महत्ता है। उन्होंने दानी परिवारों का आभार प्रकट किया और समाज से अधिक से अधिक संख्या में इस अभियान से जुडने की अपील की। यूसीएमएस की एनाटॉमी हेड डॉ. रेणु चौहान ने बताया कि किस प्रकार प्रत्येक मेडिकल छात्र एक-एक कैडेवर (दान की गई देह) से चिकित्सा विज्ञान की बारीकियाँ सीखता है। उन्होंने यह भी साझा किया कि कॉलेज के विद्यार्थी स्वयं भी समाज को इस विषय पर जागरूक करने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।
भ्रांतियों का निवारण और महर्षि दधीचि का आदर्श
वृंदावन से आईं साध्वी समाहिता जी ने समाज में व्याप्त धार्मिक भ्रांतियों को दूर करते हुए प्रथम देहदानी महर्षि दधीचि के महान त्याग और बलिदान का स्मरण कराया। उन्होंने कहा कि मृत्यु से पूर्व ऐसा पुण्य कार्य करना जीवन की सार्थकता को दर्शाता है। इसके पश्चात समिति के महामंत्री डॉ. विशाल चड्ढा ने दानी परिवारों के सदस्यों को मंच पर आमंत्रित कर उनका अभिनंदन करवाया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी प्रबुद्ध जनों ने दिवंगत पुण्य आत्माओं के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए दो मिनट का मौन रखा और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
स्पेन से प्रेरणा और भावुक संस्मरण
कार्यक्रम के अंतिम चरण में समिति के संरक्षक श्री आलोक कुमार ने पुरानी स्मृतियों को साझा करते हुए कमल बेरी और उनकी धर्मपत्नी के देहदान के संकल्प को याद किया। उन्होंने गोपाल कृष्ण अरोरा के देहदान का एक अत्यंत भावुक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि उनका पार्थिव शरीर इसी यूसीएमएस कॉलेज में दान किया गया था। कुछ दिनों बाद उनके नाती ने, जो इसी कॉलेज का छात्र था, अपने पिता को फोन कर बताया कि वह अपने ही नाना के शरीर पर चिकित्सा शिक्षा प्राप्त कर रहा है। यह सुनना पूरे सभागार को भावविभोर कर गया।
श्री आलोक कुमार ने एक महत्वपूर्ण तथ्य रखते हुए कहा,"विश्व में इस समय स्पेन अंगदान के क्षेत्र में सबसे आगे है, जबकि भारत अभी इस सूची में काफी पीछे है। हमें इस अंतर को मिटाना होगा और सबके सामूहिक सहयोग से ही भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर और अग्रणी बनेगा।"
कार्यक्रम के समापन पर संयोजक श्री अशोक बंसल ने इस सफल और प्रेरणादायी आयोजन के लिए आए हुए सभी अतिथियों, दानी परिवारों और संभ्रांत नागरिकों का हृदय से धन्यवाद और आभार व्यक्त किया।

