अंगदान और देहदान को लेकर समाज में हमेशा सम्मान और संवेदना का भाव रहा है। किसी व्यक्ति के निधन के बाद उसके अंग किसी दूसरे को जीवन दे सकते हैं और उसका शरीर चिकित्सा शिक्षा तथा शोध के काम आ सकता है। यह मनुष्य की उन दुर्लभ उदारताओं में से एक है, जो मृत्यु के बाद भी जीवन और ज्ञान की सेवा करती है।
लेकिन विज्ञान और तकनीक के इस नए दौर में देहदान का अर्थ पहले जैसा नहीं रह गया है। इसके साथ कुछ नए प्रश्न भी खड़े हो रहे हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
कुछ दशक पहले तक देहदान का मतलब मुख्य रूप से चिकित्सा छात्रों को मानव शरीर की संरचना समझने का अवसर देना था। आज स्थिति बदल चुकी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जीनोमिक्स, जैविक अनुसंधान और डिजिटल स्वास्थ्य तकनीकों ने मानव शरीर को देखने का नज़रिया बदल दिया है। मनुष्य का शरीर एक खुली किताब की तरह है। वैज्ञानिक उसकी कोशिकाओं और जीनों को पढ़कर उसके स्वास्थ्य, बीमारियों और वंशानुगत विशेषताओं के बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं। इसलिए आज देहदान केवल शरीर का दान नहीं, बल्कि ज्ञान के एक ऐसे स्रोत को साझा करना भी है, जिससे भविष्य के शोध और नई चिकित्सा तकनीकों का विकास संभव हो सकता है।
यहीं से एक नया प्रश्न जन्म लेता है। जब कोई व्यक्ति अपना शरीर या जैविक नमूने शोध के लिए दान करता है, तो उससे प्राप्त जानकारी का स्वामी कौन होता है? क्या वह केवल उस अस्पताल या शोध संस्था की संपत्ति बन जाती है? क्या भविष्य में किसी दवा, तकनीक या व्यावसायिक उत्पाद के विकास में उस जानकारी का उपयोग किया जा सकता है? और यदि ऐसा होता है, तो उस जानकारी के उपयोग की सीमाएं कौन तय करेगा?
यह प्रश्न विज्ञान-विरोधी नहीं है। बल्कि विज्ञान और समाज के बीच भरोसे को मजबूत करने वाला प्रश्न है। चिकित्सा अनुसंधान को अधिक से अधिक जैविक जानकारी की आवश्यकता होती है। इसी के आधार पर नई दवाएँ बनती हैं, रोगों की पहचान आसान होती है और उपचार के बेहतर तरीके विकसित होते हैं। लेकिन जिस तरह डिजिटल दुनिया में व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा पर चर्चा हो रही है, उसी तरह जैविक डेटा की सुरक्षा और उसके उपयोग पर भी चर्चा जरूरी है।
भारत में अभी अंगदान और देहदान को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया जाता है, जो उचित भी है। लेकिन इसके साथ पारदर्शिता का प्रश्न भी जुड़ना चाहिए। दान करने वाले व्यक्ति और उसके परिवार को यह स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि शरीर या जैविक नमूनों का उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया जाएगा। विज्ञान को विश्वास की जरूरत होती है, और विश्वास तभी बनता है जब जानकारी खुली और स्पष्ट हो।
आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जैविक तकनीकों के नए युग में प्रवेश कर रही है, तब देहदान की चर्चा भी नए संदर्भों में होनी चाहिए। यह केवल परोपकार का विषय नहीं रह गया है। यह निजता, स्वामित्व, नैतिकता और नागरिक अधिकारों का विषय भी बन चुका है।
अंगदान और देहदान की महान परंपरा को आगे बढ़ाना आवश्यक है। लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि दान की गई देह से प्राप्त जानकारी का उपयोग जिम्मेदारी, पारदर्शिता और मानवीय मूल्यों के अनुरूप हो।
आने वाले वर्षों में शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होगा कि हमने अपना शरीर किसे सौंपा, बल्कि यह होगा कि हमने अपने शरीर में छिपी जानकारी का भविष्य किसके हाथों में सौंपा। यही वह बहस है, जिसे अब समाज, विज्ञान और नीति-निर्माताओं को मिलकर आगे बढ़ाना होगा।
शुभाकांक्षी
मंजु प्रभा