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Vol. 2

Dadhichi Deh Dan Samiti,
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अध्यक्ष की कलम से

वर्ष 2014 मेरे लिए कष्टदायक रहा।  दुर्दैव से माँ, पिताजी दोनों का ही इसी वर्ष देहांत हुआ।  अपने जीवन कल में उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि मरणोपरांत उनका शरीर मैडीकल कॉलेज के बच्चों की शिक्षा के लिए दान हो।  5 जुलाई को अपनी माँ की देह को दान करने के लिए जीटीबी हस्पताल पंहुचा। वहाँ के डाक्टर ने बताया कि चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थी देह को परत दर परत खोल कर, इससे शरीर रचना को पढेंगे। यह सुन कर मुझे लगा कि माँ स्वर्ग में कितनी संतुष्ट हो रही होंगी। जीवन भर उन्होंने हम सबकी सेवा की और  मृत्यु के बाद भी उनकी देह का हर पोर काम आयेगा। 

ऐम्स में अस्थि रोग विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर राजेश मल्होत्रा ने मृत देह की एक और महत्वपूर्ण उपयोगिता को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया, यदि किसी मरीज की क्षतिग्रस्त अस्थि के लिए अन्य मानव की मैचिंग अस्थि मिल जाये, तो वह बहुत शीघ्र स्वस्थ हो जायेगा। वर्तमान में इस तरह की मानव अस्थियों का बहुत अभाव है।

इस बीच 15 जून 2014 को संपन्न अपनी कार्यकारिणी की बैठक में यह तय किया गया था कि, दिल्ली से प्रति वर्ष श्रद्धालु दधीचि की दर्शन यात्रा पर जायेंगे। वहां जहाँ महर्षि दधीचिने युगों पहले अपनी अस्थियाँ देव संस्कृति की रक्षा के लिए दान की थी। यह स्थान उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में है और इसका नाम है मिश्रिख। इसकी तैयारी के लिए, 13 अक्टूबर को मैं श्री प्रमोद अग्रवाल व श्री सुधीर गुप्ता के साथ मिश्रिख गया। मिश्रिख में महर्षि दधीचि का आश्रम है, इसका नाम 'सर्वाकार श्री महर्षि दधीचि आश्रम' है। यहाँ एक विशाल सरोवर है। आश्रम के महंत श्री देव दत्त गिरी ने सरोवर के बारे में बतया। महर्षि दधीचि द्वारा अस्थि-दान का निर्णय लेने के बाद, देवताओं ने सभी तीर्थों का जल लाकर इस सरोवर को भरा, उस जल से महर्षि दधीचि ने स्नान किया। इसके बाद कामधेनु ने, उन्हें कष्ट दिए बिना, उनकी सम्पूर्ण देह को चाट-चाट कर अस्थि-पंजर में बदल दिया। उस अस्थि-पंजर से देवताओं ने व्रज बनाया और वृत्रासुर का वध किया। आश्रम में यह श्लोक लिखा हुआ है:-

धन्योअहं चास्थि मे धन्यं यस्माद्देवाः प्रवृद्धये ।
ददामि नास्ति संदेहो नियमश्च मायाकृतः । ।

अर्थ है – "मैं धन्य हूँ, मेरी अस्थियाँ धन्य हैं, जिनके द्वारा देवताओं की अभिवृद्धि होगी। निःसंदेह मैंने संकल्प लिया है कि मैं अस्थियाँ दान करूँगा।"

स्वयं मैं, स्वप्नों और कल्पनाओं में जीता हूँ। यह श्लोक पढते ही, मृत्यु के बाद मेरी देह की उपयोगिता, एक चलचित्र के समान मेरी आँखों के सामने, मानो साकार हो गई। मैंने देखा, मेरी देह की अस्थियाँ दान हो रही हैं, इनसे लोग स्वस्थ हो रहे हैं। धन्य हैं, मेरी अस्थियाँ। मैंने देखा, मेरी मृत देह के हर पोर को परत-दर-परत खोला जा रहा है। मेरे जीवन में मेरे घुटने सीढी चढ़ते समय कष्ट देते रहे, लेकिन मैंने अपने भाव-चलचित्र में देखा, विद्यार्थी मेरी देह पर बीमारों के घुटने बदलने का अभ्यास कर रहे हैं।

मुदित मन से मैं दधीचि आश्रम के सरोवर की ओर चल पड़ा। सरोवर के जल से मैंने आचमन और अंग स्पर्श किया। साथ ही, मन ही मन प्रार्थना की, कि मैं सौ वर्ष तक स्वस्थ और अदीन रह कर इस समाज के लिए पुरुषार्थ करूँ और मृत्यु के बाद, देह रूपी पुराना वस्त्र पूरा का पूरा मानव सेवा के काम आ जाये।

स्वस्थ भारत के निर्माण में यही हमारा सबल योगदान है। आइये, हम सब इस दधीचि परंपरा के सहभागी बनें।

We invite you to join in this Noble Mission.
समिति के ईजरनल के प्रवेशांक का लोकार्पण...
श्रद्धा सुमन...
In death Kavita Karkare matched her
husbandís sacrifice by donating...
Breaking surgery involved transplanting
cells from the nose to the spinal cord ...
अस्थि दान (Bone Donation)
आचार्य राजेष (AIIMS)
Letter to the editor ......
Dr. Vinay Aggarwal

समिति के ईजरनल के प्रवेशांक का लोकार्पण

दधीचि ऋषि के आविर्भाव दिवस की पूर्व संध्या गत 1 सितम्बर 2014 को देश की राजधानी  नई दिल्ली में संसद मार्ग स्थित यातायात भवन के खचाखच भरे सभागार में केन्द्रीय मंत्री (सड़क परिवहन राजमार्ग एवं पोत परिवहन)     भारत सरकार, के करकमलों द्वारा दधीचि देहदान समिति के अन्तर्राष्ट्रीय ई-जर्नल का लोकार्पण  किया गया। इस अवसर पर धर्मयात्रा संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मांगे लाल गर्ग, दिल्ली प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के  अध्यक्ष सतीश उपाध्याय, उत्तर पूर्वी दिल्ली के  सांसद मनोज तिवारी, दधीचि देहदान समिति के अध्यक्ष आलोक कुमार(एडवोकेट), महामंत्री हर्ष मल्होत्रा (अध्यक्ष, शिक्षा समिति, पूर्वी दिल्ली नगर निगम) के अतिरिक्त दर्जनों गणमान्य नागरिकों, सामाजिक राजनैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे।

समारोह के अवसर पर केन्द्रीय मंत्री गडकरी में समिति के द्वारा निस्वार्थभाव से की जा रही समाज की सेवा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उनके विचार में व्यक्ति को जीवन के अन्तिम क्षण तक लोक हित के कार्य करने चाहिये। उन्होंने हाल ही में ग्रामीण विकास मंत्रालय के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के उद्धाटन समारोह में आमन्त्रित भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम के उद्बोधन का हवाला देते हुये कहा कि लोक सेवा, लोक जागरण व लोक शिक्षण के द्वारा लोगों के नया जीवन देना ही सही अर्थ में राजकाज है। इसलिये राजनीति में लगे हुये लोगों को शत-प्रतिशत लोक सेवा में अपना जीवन लगाना चाहिये। केन्द्रीय मंत्री ने अपने जीवन का उदाहरण देते हुये कहा कि जब वह महाराष्ट्र विपक्ष के नेता थे तब उन्होने साढ़े छैः हजार हृदय के आपरेशन निःशुल्क कराये जिसका परिणाम यह हुआ कि इन स्वस्थ हुये के शुभाषीश की शक्ति ने उन्हें व उनके परिवार को एक प्राणघातक कार दुर्धटना से बचा लिया।

इस कार्यक्रम में समिति के अध्यक्ष श्री आलोक कुमार ने विस्तार से देहदान के विषय पर चल रहे आन्दोलन की जानकारी दी। उन्होंने देहदान आन्दोलन के महत्व को रेखाकिंत करते हुये कहा कि जब एक देहदानी अपने देह को समाज देवता के चरणों में अर्पित कर देता है तो वह उस देह का वह स्वामी नही वरन् ट्रष्टी बन जाता है। वह अपने देह के द्वारा सामान्य भाव से दैन्यदिन के कार्यों को सम्पादित करते हुये देहजन्य मोह से विलग रहता है। उसके सारे कर्म निष्काम हो जाते हैं। उसका जीवन एक तपष्या का रुप लेने लगता है वह परमानन्द की अनुभूति में जीता है, उसे मृत्यु की भय लेश मात्र भी नहीं रहता। ऐसे दानी की मुक्ति निश्चित है। सच तो यह है देहदान मुक्ति का प्रथम सोपान है। यह मानवता की सेवा ही नही वरन् आत्मोत्थान का पहला चरण है।

अध्यक्ष ने भारत के प्रधान मन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की हाल में सम्पन्न जापान यात्रा का जिक्र करते हुये कहा कि क्योटो जैसे प्राचीन आध्यातिमक शहर में मोदी जी न केवल भव्य मन्दिरों के दर्शन कि वरन् वहां की अत्याधुनिक स्टेम सेल रिसर्च सेन्टर मे जा कर इस विषय पर हो रही ताजा शोधों की भी गहन जानकारी प्राप्त की। साथ भारत-जापान की बीच इन शोधों पर आपसी सहयोग का एक वृहद समझौता भी किया। साथ ही आलोक जी नें दधीचि और अखिल भारतीय शोध संस्थान द्वारा हाल ही पुनरप्रारम्भ स्टेम सेल व बोनमैरो डोनेशन की एशियन सजिस्ट्री का उल्लेख करने हुये यह आशा जताई की प्रधानमन्त्री के स्टेम सेल पर अत्याधुनिक शोध की महती योजना का हमारे दानियों द्वारा दान हेतु प्रस्तुत स्टेम सेल इस योजना के ध्वज वाहनी का कार्य करेंगे।

ई-जर्नल के प्रधान सम्पादक श्री महेश पंत के आग्रह पर माननीय केन्द्रीय मन्त्री ने कमप्यूटर माउस का बटन दबा कर लोकार्पण किया। पंथ के अनुसार यह जर्नल द्विमासिक होगा। किसी स्वयम् सेवी संस्थान के द्वारा प्रकाशित पहला अन्तरराष्ट्रीय स्तर का स्वदेशी द्विभाषीय शोधपरक मानव स्वाथ्य एवं देहदान-अंगदान पर पहला ई-जर्नल होगा। उन्होने सभी विषय वस्तु के प्रस्तुतिकरण की नीति को गहराई से समझाया।

इस कार्यक्रम का कुशल संचालन महामंत्री श्री हर्ष मल्होत्रा ने किया। अन्त में उपाध्यक्ष डा. आशीष सरकार ने सभी सहानुभावों को दधीचि की ओर से धन्यवाद दिया।

श्रद्धा सुमन

जिंदगी से तो सभी प्यार किया करते हैं, हम तो, ‘देहान्त के पश्चात् भी अपनी देह या देह के अवयव मानवता की भलाई हेतु अर्पित करेंगें।ऐसे ही उद्गारों से ओत-प्रोत, सर्वस्व समर्पित करने वाले -देह/देह के अवयव दान करने वाले देह-दानियों को’,‘दधीचि देह दान समितिपरिवार अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता है।...............

देहदानी - श्री दीपक कुमार

श्री दीपक कुमार निवासी फेस-3, सुशान्त लोक, गुड़गांव, का देहान्त 48 वर्ष की आयु में 07.09.2014 को हुआ था। धर्मपत्नी श्रीमती कोमल जी ने इनकी माता जी की प्रेरणा से एवं समस्त परिवार जनों की सर्वसम्मति से ‘दधीचि देह दान समिति’ से सम्पर्क किया। समिति द्वारा इनके नेत्र-‘श्रौफ अस्पताल’ में एवं देह-‘हमदर्द कालेज’ को शोध हेतु प्रदान की गयी।
दीपक जी हार्डवेयर व्यापारी और बेहद खुशमिज़ाज इंसान थे। मृत्यु की परिकल्पना मात्र 48 बरस में अकल्पनीय लगती है। परन्तु हमेशा दिल में परोपकार की भावना रखने वाले दीपक जी अक्सर कहा करते थे कि ‘ मैं स्वयं तो शुगर का मरीज हूं इसलिए सम्भवतः मेरी किडनी इत्यादि मरणोपरान्त भले ही काम न आए परन्तु यह देह काम आ सके किसी के यही कामना है।’ आपको सादर नमन...........

देहदानी - श्री विश्वामित्र महाजन

 श्री विश्वामित्र महाजन, निवासी गीता कालोनी, दिल्ली। जिनका निधन 86 वर्ष की आयु में 08.09.2014 को हुआ। इनकी पुत्री श्रीमती मधु महाजन के द्वारा इनके नेत्र-‘गुरू नानक आई सैण्टर’ में एवं देह-‘मौलाना अब्दुल कलाम मेडिकल कालेज’ को मेडिकल छात्रों के शोध हेतु प्रदान की गईं।
आपका जन्म 1.09.1988 को पंजाब प्रान्त के जिला गुरदासपुर, ग्राम डोरांगला में हुआ था। देषभक्ति की भावना से ओतप्रोत विष्वामित्र जी संघ के प्रचारक भी रहे और कुछ समय के लिए आपने सेना में भी नौकरी भी की। इसके पश्चात आपने अध्ययन का क्षेत्र चुन लिया।
विष्वामित्र जी ने केन्द्रीय महाजन मित्रमण्डल, हंसराज स्मारक सोसायटी एवं महाजन को-आपरेटिव सोसायटी जैसी संस्थाओं की स्थापना की। आप आर0 डब्ल्यू0 ए0 के प्रेसीडेण्ट भी रहे तथा बनवासी कल्याण आश्रम एवं हिन्दू शिक्षा समिति से भी सक्रिय रुप से जुड़े रहे। जीवन की इस सान्ध्य बेला में भी आप सतत सक्रिय रहे ओैर विगत एक वर्श से महाजन मित्र मासिक पत्रिका का संपादन भी कर रहे थे। आपके 5 पुत्रियां हैं। आपको विनम्र श्रद्धांजलि.........

नेत्रदानी - श्रीमती संतोश पुरी

इसी श्रृंखला में एक और नेत्रदानी हैं-भूतपूर्व निगम पार्षद स्व. श्री शिवदास पुरी जी (जिनके नाम से मोती नगर में ही शिवदास पुरी मार्ग भी है)  की धर्मपत्नी श्रीमती संतोश पुरी जी, निवासी मोती नगर, नई दिल्ली। जिनका निधन 72 वर्ष की आयु में 25.09.2014 को हुआ।
इनके नेत्र इनके पुत्र चन्द्रषेखर पुरी द्वारा, जो न्यू मोती नगर स्थित सनातन धर्म मन्दिर, पुरी मन्दिर के प्रधान भी हैं, ‘गुरू नानक आई सैण्टर’ को प्रदान किए गए। आपको शत-शत नमन......

Noble Spirit: In death Kavita Karkare matched her husbandís sacrifice by donating organs

Her husband had become a martyr fighting terrorists during the 26/11 attacks in Mumbai. She gave life to three people in her death. Kavita Karkare, wife of slain former Mumbai Anti-Terror Squad chief Hemant Karkare, passed away due to a brain haemorrhage. But in consenting to donate her organs, Kavita’s children have lived up to their parents’ bravery and sacrificing spirit. It’s learnt that Kavita’s kidneys were received by two patients who had been waiting for a transplant for several years. Meanwhile, her liver gave a new lease of life to a 49-year-old patient and her eyes were donated to an eye bank. The gesture deserves praise and a toast needs to be raised to the Karkare family.

That said, the incident also highlights the urgent need for others to follow Kavita and her children’s example. Organ donation in India continues to suffer from an acute shortage. Every year nearly five lakh people die in the country because of non-availability of donor organs. Lack of awareness, religious taboos and government apathy are responsible for this deplorable state of affairs. That we don’t even have a centralised registry of organ donors is truly shocking. This has seen the trade in organs flourish and corruption in the organ donation system persist. The only way to reverse this is to boost voluntary and deceased-organ donations.

Much like blood donation campaigns, the government must work with NGOs to raise awareness and encourage people to register for organ donation. Plus, it’s time to create a centralised registry for organ donors so that they can be tracked and consent obtained from their families when the time comes. Each individual can save up to seven lives through organ donation. Kavita and her children have already saved three. Donating one’s organs is the highest form of altruism. Let’s not shy away from becoming donors.

Surgical Breakthrough Allows a Completely Paralyzed Man to Walk Again

LONDON: In a major medical breakthrough, a man who was completely paralyzed from the waist down due to a severely fractured spine got up from his wheel chair and walked away, offering hope to millions of people who are disabled by spinal cord injuries.

A joint team of British and Polish doctors have for the first time ever reversed a complete spinal paralysis by using nerve-supporting cells from the nose of Darek Fidyka, a Bulgarian fire fighter man who was injured four years ago and has been in a wheelchair since 2010, to create a pathway along which the broken tissue was able to regrow.

Fidyka was left majorly paralyzed during a knife attack and is now feeling the restoring sensation and muscle control to his legs. The 38-year-old can now not only walk with a frame but can also drive a car.

The treatment has also helped recover Fidyka's bladder and bowel sensation and sexual function. Doctors involved in this breakthrough are now trying to raise £10 million to fund surgery in Poland for 10 similar patients so that the technique can be further refined over the next five years.

The surgery was performed by a Polish team led by Dr Pawel Tabakow from Wroclaw Medical University while the discovery of the technique was made by professor Geoffrey Raisman from the University College London's institute of neurology.

The path breaking surgery funded by the Nicholls Spinal Injury Foundation (NSIF) and the UK Stem Cell Foundation involved transplanting olfactory ensheathing cells (OECs) from the nose to the spinal cord.

Once relocated to the spinal cord, they enabled the ends of severed nerve fibres to grow back and join together.

अस्थि दान,अस्थि कोष एवं अस्थि प्रत्यारोपण

आचार्य राजेष मल्होत्रा
अस्थि प्रत्यारोपण विशेषज्ञ
एम.बी.बी.एस. (AIIMS)]  एम.एस. (AIIMS)]  एफ.आर.सी.एस.
एफ.ए.सी.एस.,  एफ.आई.एम.एस.ए.,  एम.एन.ए.एस सी.

शरीर के कई अंगों की भाँति अस्थियाँ भी कोष में रखी जा सकती हैं और उनका प्रत्यारोपण संभव है। किसी मनुष्य की अस्थियाँ कई कारणों से विक्षत हो सकती हैं जैसी कि दुर्घटना में, कैंसर के कारण, इन्फेक्शन के कारण, जोड़ प्रत्यारोपण के आप्रेशन फेल अथवा कई वर्षों के बाद घिस जाने के कारण इत्यादि। यदि किसी व्यक्ति की हडडी में बहुत बड़ा दोष आ जाने पर या तो धातु की बनी कृत्रिम ढाँचानुमा चीज (Implant) लगाई जा सकती है अथवा अस्थि प्रत्यारोपण द्वारा उसका उपचार किया जा सकता है।

अस्थि दान कौन कर सकता है?
18 से लेकर 65 वर्ष की आयु के लोग जिन्हें कोई संक्रामक रोग, कैंसर, गठिया इत्यादि रोग नहीं है, अपनी अस्थियाँ दान कर सकते हैं। अस्थियाँ मरणोपरांत ही दान की जाती हैं लेकिन जिन व्यक्तियों को जीवन सहायक (Life support) उपकरणों पर जिंदा रखा गया हो अथवा वह दिमागी तौर मृत (Brain dead) हों तो वह भी अस्थिदान कर सकते हैं।

क्या शरीर की सभी अस्थियाँ निकाल ली जाती हैं ? ऐसे में अंतिम संस्कार, अस्थि विसर्जन इत्यादि कैसे हो ?
अस्थिदान में केवल शरीर के निचले अंगों की अस्थियाँ ही सामान्यतया निकाली जाती हैं। उनके निकाले जाने पर भी शरीर की कुल 206 अस्थियों में से अधिकतर मृतक के शरीर में ही रहती है और यथाविधि अंतिम संस्कार के लिय पर्याप्त होती है।

क्या अस्थिदान के पष्चात् शरीर क्षत विक्षत नहीं हो जाता ?
अस्थिदान के पश्चात् विशेष रूप से निर्मित लकड़ी के डडों और रूई द्वारा अंगों का पुनर्निमाण कर दिया जाता है जिससे यह आभास भी नहीं होता कि शरीर के निम्न अंगों में से हडिडयाँ दान कर दी गई है। रूई द्वारा अंगों के उभारों को दुबारा आकार देने से शरीर में किसी प्रकार की विकृति का आभास नही होता है।

अस्थि प्रत्यारोपण के लिए क्या रक्त वर्ग का मिलान आवष्यक है ?
अस्थि प्रत्यारोपण के लिए किसी प्रकार के मिलान अथवा मैच की आवश्यकता नहीं होती है। एक व्यक्ति की हडडी का किसी भी और व्यक्ति के शरीर में प्रत्योरपण किया जा सकता है और उसमें किसी प्रकार का अस्वीकरण नहीं होता।

अस्थिकोष में अस्थियाँ कितने समय तक रखी जा सकती हैं ?
शून्य से 80 डिग्री नीचे वाले तापमान पर यह अस्थियाँ पाँच वर्ष तक रखी जा सकती हैं।

मृत्यु के कितने समय बाद तक अस्थियों का दान संभव है ?
सामान्य तापमान पर मृत्यु के 12 घंटे बाद तक और 4 डिग्री पारे के तापमान पर फ्रीज़र में रखें शव से 48 घंटे तक अस्थियाँ दान हेतु ली जा सकती हैं।

क्या इन अस्थियों के कोष बनाने और प्रत्यारोपण के लिए विषेष प्रषिक्षण की आवष्यकता होती है ?
इस प्रकार की तकनीक के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवशयकता होती है। भारत में अ.भा.आ.वि. संस्थान (AIIMS)  मे यह कोष पिछले 15 वर्षों से कार्यरत है। इस प्रणाली से इन वर्षो में सैकड़ों रोगियों को राहत मिली है और विश्व भर में कई विशिष्ट पत्रिकाओं में इनका वर्णन है। इस प्रणाली की उलब्धता के चलते देश भर में अस्थिरोग संबंधी अधिकतम जटिल व्याधियों का उपचार भी (AIIMS) में सहज संभव है और इसके लिए रोगी से कोई अतिरिक्त राशी नहीं ली जाती है। फेल हुए जोड़ प्रत्यारोपण, कैंसर इन्फेकशन इत्यादि के रोगियों को इससे अत्यंत लाभ की प्राप्ति हुई है।

अस्थि प्रत्यारोपण बाकी अन्य अंग प्रत्यारोपण से किस प्रकार भिन्न है ?
जहाँ गुर्दा, यकृत, हृदय आदि अंगों के प्रत्यारोपण जीवन दायक होते हैं, वहीं  अस्थि प्रत्योरपण जीवन की गुणवत्ता का संवर्धन मात्र ही करता है। लेकिन जहाँ नेत्र और बाकी अंगों के दान से एक या दो व्यक्तियों को लाभ होता है, वहीं एक व्यक्ति मात्र के अस्थि दान से 15-20 व्यक्तियों का भला हो सकता है और बहुत से रोगी जो शय्याग्रस्त हैं, एक बार फिर किसी और की टाँगों पर खड़ें हो सकते हैं।

Letter to the Editor

Dear Sh. Alok Ji,

Life is precious, too precious to be lost to an organ failure. But millions of people actually lose their lives every year because a vital organ fails to function in their body. On the other hand, it is quite unfortunate that due to religious and old conceptions, hundreds of thousands of healthy organs are buried every year, burnt on funeral pyres or otherwise destroyed as critically ill patients continue to hang on to life, praying for a miracle.
Changing the mindset of the society is the biggest challenge. It is the need to understand that organ donation is indeed an unique and the most selfless opportunity to help and give new life to thousands of people waiting for organ or tissue transplantation.

Over the years, medical science has evolved tremendously and in today’s times, Cadaveric Organ Transplantation is being carried out routinely in many centres across India. This programme has been very beneficial for those patients who had lost all hope of complete recovery. However, the incidence of patients seeking organ donation is increasing every day due to huge burden of chronic organ failures. This demand can only be met by Cadaveric Organ Donation Programmes.

It is indeed very credible that Dadhichi Dehdan Samiti is playing a very important role in serving the humanity by encouraging people to donate organs after their death. This will go a long way in spreading awareness about organ donation and saving precious lives.

It is my privilege to be associated with this esteem organization which has been working with absolute passion and commitment in delivering services, developing policies and promoting organ/tissue donation over the years. I wish them all luck for future in working towards alleviating the great human suffering and making death as meaningful as life.

Dr. Vinay Aggarwal
Chairman & Managing Director, Pushpanjali Crosslay Hospital
Member, Medical Council of India
Vice President, Delhi Medical Council
Imm. Past President, CMAAO
Past National President, Indian Medical Association